Top 10 Moral Stories in Hindi For Kids – बच्चों की कहानियाँ

October 5, 2019 Education, Study Materials
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हमने यहाँ प्रेरणादायी और नैतिक मूल्यों आधारित Top 10 Moral Stories दी है. ये सभी प्रेरणादायी कहानिया बच्चो के लिए है. यहाँ से आप नैतिक शिक्षाप्रद कहानियाँ, जीवन मूल्य पर कहानी, प्रेरणादायी बोधकथा हिंदी में पढ़ सकते है. Moral instructive stories in hindi, kids Story on life skills, Inspirational parable, Motivational Story for kids, Hindi me Kahaniya Bachcho ke liye PDF Book Free Download. सबसे बेस्ट हिंदी कहानिया. बालावार्ता हिंदी में पढ़े. ये सभी ( Top 10 Moral Stories in Hindi ) कहानिया class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 के बच्चो की क्षमता आधारित है.

वैसे तो बाल कहानिया शिक्षा का ही एक topic है. कहानी किसी भी subject, विषय, या पात्र आधारित हो इसका एक विशेस उदेश्य होता है. कहानी से सिर्फ छात्रो को ही नहीं सभी लोग प्रेरणा पाते है. Top 10 Moral Stories कहानियाँ मनोरंजक और रोचकता के साथ—साथ बच्चों को नैतिक ज्ञान, संस्कार, धर्म, प्रेम और त्याग का पाठ भी पढ़ाएँगी।

Top 10 moral stories in hindi

कहानियाँ तो हम सभी को जीवन में आगे बढ़ने की सीख देती हैं। ये रोचक और सरस कहानियाँ हमें अपना काम ईमानदारी से करने, एक बेहतर और संवेदनशील इनसान होने, किसी बड़ी से बड़ी मुश्किल के आगे न झुकने और जीवन में हमेशा सफलता की नई-नई ऊँचाइया पर पहुँचाने का काम करती है.

किसी भी कहानी में छिपे रहस्य और इनमे से मिलनेवाले life skills और बोध के फल को ( जिवनमंत्र मंत्र को) पाने के लिए जरुरी है की कहानी को पुरे ध्यान से पढ़े. तब आप इसका आनंद ले पायेंगे.

Top 10 Moral Stories hindi for children kids ki kahaniya

New Moral stories in hindi

“परिश्रम से सफलता ” कहानी लेखन

एक था कुक्कू। बड़ा ही प्यारा, छोटा सा नटखट बच्चा। एक बार वह अपने घर के बाहर मैदान में खेल रहा था। तभी उसे एक पिल्ला दिखाई दिया। छोटा सा पिल्ला जो रह-रहकर उछल रहा था। देखकर कुक्कू को हँसी आई। पिल्ला बोला, “हँसो मत, हँसो मत। मैं सबसे तेज दौड़ने वाले पिल्ले का खिताब जीतने पंपापुर जा रहा हूँ। अभी प्रतियोगिता में पूरे सात दिन बाकी हैं इसलिए रात-दिन अभ्यास कर रहा हूँ। चाहो तो तुम भी मेरे साथ दौड़ो।”

कुक्कू को हैरानी हुई। वह डब्बू पिल्ले के साथ दौड़ा और उसे हरा दिया। पर डब्बू पिल्ले की चाल भी वाकई कम नहीं थी। इस बात ने कुक्कू को चकरा दिया।

अब तो कुक्कू और डब्बू पिल्ला रोज-रोज दौड़ते। डब्बू की चाल दिनोदिन तेज होती जाती। सातवें दिन उसने कुक्कू को हरा दिया। डब्बू बोला, “बस कुक्कू, आज ही मैं पंपापुर जा रहा हूँ। देखना, जीतकर लौटूँगा।”

कुछ रोज बाद डब्बू पिल्ला लौटा, तो वाकई उसके सिर पर चम-चम चमकता सुनहला मुकुट था। गले में एक बिल्ला लटक रहा था। उस पर लिखा था—’दुनिया का सरताज डब्बू पिल्ला जिसने दौड़ में सबको हरा दिया!’

कुक्कू ने उसे बधाई दी, तो डब्बू बोला, “ऐसे नहीं, तुम भी तेज दौड़ो। कुछ साल बाद ओलंपिक से सोने का मैडल लेकर आओ। तब होगी मुझे खुशी।”

कुक्कू की आँखों में चमक आ गई। बस, तभी से उसने तेज-तेज दौड़ने का अभ्यास शुरू कर दिया। आसपास हर जगह से उसे ढेरों इनाम मिले। पर उसका सपना तो है ओलंपिक! ओलंपिक से मैडल जीतकर आएगा, तो वह सबसे पहले डब्बू के पास जाकर कहेगा, “धन्यवाद डब्बू, धन्यवाद! तुमने मेरी आँखें खोल दीं।”

यह सोचते ही कुक्कू के चेहरे पर एक मीठी-मीठी सी मुसकान दौड़ जाती है। और वह मन ही मन कहता है, ‘डब्बू, जिंदाबाद!’

शरारती बंदर की मुसीबत kahani Hindi

दक्षिण दिशा में किसी नगर में एक व्यापारी रहा था । व्यापारी धार्मिक स्वभाव का था । एक बार उसके मन में आया कि मुझे देव मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए । उसने मित्रों और परिवार वालों से कहा, तो सबने खुशी प्रकट की । कहा कि यह नेक काम तो जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा है ।

उसी समय व्यापारी ने उचित स्थान देखा और मंदिर का निर्माण-कार्य शुरू करवा दिया । वहाँ ईंटें, पत्थर, लकड़ी का सामान और निर्माण-कार्य में कारीगर बड़े उत्साह से मंदिर के निर्माण में जुटे थे । वे दिन भर काम करते, फिर दोपहर को खाना खाकर कुछ देर विश्राम करते ।

पर जिस स्थान पर मंदिर का निर्माण हो रहा था, वहीं आसपास बंदरों की एक टोली भी रहती थी । जिस समय कारीगर छाया में विश्राम कर रहे होते, शरारती बंदरों की टोली वहाँ आकर खूब उपद्रव करती । कुछ बंदर पत्थरों के ढेर पर चढ़कर कूदते तो कुछ वहाँ पहुँच जाते, जहाँ लकड़ी का काम चल रहा था । और फिर उनकी ऊधमबाजी और अजीबोगरीब शरारतें शुरू हो जातीं । एक दिन की बात, बंदरों की टोली इसी तरह अजीबोगरीब करतब और शरारतें कर रही थी । तभी अचानक एक बंदर का ध्यान लकड़ी के तख्ते की ओर गया । उस तख्ते को बीच से चीरकर उसमें एक बड़ी सी कील फँसा दी गई थी । शरारती बंदर को अब यह नया खेल सूझ गया । वह अब बीच से चीरे गए उस लकड़ी के तख्ते में से कील निकालने के काम में जुट गया । लेकिन कील भी अंदर तक फंसी हुई थी । वह भला इतनी आसानी से कैसे निकल जाती?

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बंदरों के मुखिया ने उसे रोका । कहा, “भाई ऐसा न करो । इससे तुम्हें खामखा चोट लग सकती है । “ इस पर शरारती बंदर बोला, “असल में मैं देखना चाहता हूँ कि इस तख्ते में यह कील क्यों गाड़ी गई है । और इसे निकालने पर होता क्या है?” इस पर बंदरों का मुखिया चुप हो गया ।

ऊधमी बंदर अपने काम में लगा रहा । आखिर उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस कील को खींचा तो कील तो बाहर आ गई । लेकिन साथ ही उस चीरे हुए तख्ते के दोनों हिस्से एकाएक तेजी से मिले और बंदर के शरीर का पिछला हिस्सा उसमें आ गया । बंदर के अंग कुछ इस बुरी तरह कुचले गए कि वह जोर से चिल्लाया, “हाय, हाय, मरा । बचाओ.. .बचाओ!”पर मजदूर तो दूर विश्राम कर रहे थे तो भला कौन उसे बचाने के लिए आता? और थोड़ी ही देर में बंदर के प्राण-पखेरू उड़ गए ।

हाँ, उसके चेहरे परअब भी एक गहरे पछतावे की छाया थी कि मैंने बेकार अपनी शरारतों से यह मुसीबत मोल ले ली । मुझे खामखा बिना चीजों को देखे-परखे इतनी छेड़छाड़ करने की क्या जरूरत थी?

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” आशीर्वाद” कहानी हिंदी में

पुराने समय में एक सुंदर राज्य था, पूपापुर। वहाँ के राजा थे राजदेव। दूर-दूर तक उनकी कीर्ति फैली थी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी सम्मान से उनका नाम लेते थे। इसलिए कि राजा राजदेव अपनी प्रजा को बहुत चाहते थे। पंपापुर को उन्होंने बिल्कुल स्वर्ग जैसा बना दिया था।

एक बार की बात, राजा राजदेव का जन्मदिन था। सारी राजधानी को किसी दुल्हन की तरह सजाया गया। शाम के समय जन्मदिन का भव्य समारोह था।

सभी लोग एक से एक बेशकीमती उपहार राजा को भेंट करने के लिए लाए। लेकिन राजा का प्रिय दरबारी उजागरमल अभी तक नहीं आया था। राजा राजदेव ने उसके बारे में पूछा, तो किसी ने कहा, ”महाराज, उजागरमल कंजूस है। इसीलिए टाल गया है।”

सुनकर मंत्री और सेनापति जोर से हँस पड़े। उजागरमल के सामने तो उनकी कुछ चलती नहीं थी। इसलिए पीठ पीछे उसकी किरकिरी हो, तो उन्हें अच्छा लगता था।

कुछ देर बाद उजागरमल तेजी से आता दिखाई दिया। उसके पीछे-पीछेएक सेवक टोकरा भर आम लिए हुए था। देखकर सभी दरबारी हँसने लगे। बोले, ”उजागरमल, तुम्हें राजा को उपहार देने के लिए कुछ और नहीं मिला?”

राजा राजदेव भी मन ही मन हँस रहे थे। उजागरमल की बातों से हमेशा उनका मनोरंजन होता था। सोच रहे थे, देखें भला उजागरमल आज क्या कहता है?

इतने में पास आकर उजागरमल बोला, ”महाराज, आपके जन्मदिन पर क्या भेंट दूँ, कुछ सोच नहीं पा रहा था। हर चीज छोटी और मामूली लगती थी। तभी याद आया, गाँव में मेरे दादा के दादा के हाथ का लगाया एक आम का पेड़ है। उस पेड़ के आमों का स्वाद और खुशबू लाजवाब है। दूर-दूर तक उनकी सुगंध फैलती है। अब उस पेड़ पर आम तो कम लगते हैं, पर उनका स्वाद और खुशबू वैसी ही है। आपके जन्मदिन के लिए यही उपहार मुझे जँचा। दौड़ा-दौड़ा गाँव गया और वहीं से सीधा चला आ रहा हूँ। आप ये आम खाएँ, तो मेरी मेहनत सफल हो जाएगी।”

राजा ने एक आम खुद लिया और बाकी दरबारियों में बँटवा दिए। सबने वे सिंदूरी आम खाए, तो ‘वाह-वाह’ कर उठे। उन आमों का स्वाद तो अनोखाथा ही, खुशबू भी मन को तृप्त करने वाली थी।

”जन्मदिन पर मुझे एक से एक अच्छे उपहार मिले, पर सबसे बेशकीमती उपहार उजागरमल का ही था। इसलिए कि इसमें बुजुर्गों का आशीर्वाद शामिल है। और दुनिया में इससे बढ़कर कुछ और नहीं है।” कहकर राजा राजदेव ने अपने गले का हार उतारा और उजागरमल के गले में डाल दिया। सभी दरबारी जो उजागरमल का मजाक उड़ा रहे थे, अब सिर नीचा किए बैठे थे।

” सबसे भली चुप” Motivational Story For Kids

तेनालीराम के पास एक दिन ऐसा आदमी आया जो अपनी पत्नी से बहुत परेशान रहा करता था । काफी देर तक वह अपनी पत्नी के दुव्र्यवहार की बातें बताता रहा । अंत में उसकी आँखें डबडबा आईं और वह रुआँसा हो गया । अंत में उसने कहा – “ तेनालीरामजी , वह रोज ही क्लेश करती है । मैं उससे तंग आ गया हूँ । ”

तेनालीराम चुपचाप उसकी सारी बातें सुनते रहे । – उस आदमी ने सारी बातें सुनाकर तेनालीराम के पैर पकड़ लिए और बोला – “ तेनालीरामजी , मैंने आपका बड़ा नाम सुना है , इसीलिए आपकी शरण में आया हूँ । आप ही मुझे कोई उपाय बताइए । ”

तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद कर लीं और कहा — ‘ तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देते ? ’ वह आदमी बोला — ‘ कैसे छोड़ दूँ ? जाति – बिरादरी का भी तो डर है । ढोल – बाजे के साथ विवाह किया है । फिर कैसे मैं छोड़ दूँ उसे ? अब तो आग में जल जाने की धमकी भी देने लगी है । आखिर गुजारा तो उसी के साथ करना है मुझे । ’

तेनालीराम कुछ देर सोचते रहे । फिर उन्होंने कहा – ‘ तो फिर तुम एक काम करो । मैं तुम्हें एक दवा देता हूँ । घर में जब पत्नी झगड़ने लगे तो इसे मुँह में तब तक रखे रहना जब तक वह चुप न हो जाए । उसके चुप हो जाने पर मुँह का कुल्ला बाहर फेंक देना । ’

वह आदमी गर्दन हिलाते हुए बोला — ‘ जैसा आपने कहा है , वैसा ही करूँगा.

तेनालीराम भीतर गए और दवा शीशी में भरकर उस आदमी को दे दी । फिर बोले – ‘ दवा जरूर लेना । जब यह दवा खत्म हो जाए तो फिर आकर ले जाना ।

’ ‘ श्रीमान , यह आपकी बड़ी कृपा है । ” यह कहते हुए वह आदमी वहाँ से चला गया ।

उसके जाने के बाद तेनालीराम मुस्कराने लगे और मन – ही – मन कहा कि उन्होंने जो कुछ किया , वह ठीक ही किया । उस आदमी की कहानी सचमुच दुखद है ।

दवा ले जानेवाले उस आदमी ने ठीक वैसा ही किया जैसा तेनालीराम ने उससे कहा था । अगली सुबह जब वह आदमी सोकर उठा तब उसकी पत्नी जोर – जोर से बड़बड़ा रही थी । यह सुनकर उसने वह दवा अपने मुँह में भर ली । जब तक उसकी पत्नी जली कटी सुनाती रही. तब तक वह उस दावा को मुह में लिए रहा. पांति के जोर जोर से बोलने पर वह इसी तरह बराबर दवाई पीता रहा । एक दिन वह आदमी फिर तेनालीराम के पास आया और बोला “ तेनालीरामजी , आपकी दवा सचमुच बड़ी असरदार है । पत्नी ने लड़ना – झगड़ना बिलकुल बंद कर दिया है । अब आप कृपया उस दवा की एक और शीशी मुझे दीजिए ताकि कभी जरूरत पड़ने पर उसे काम में ला सकू । ’

यह सुनकर तेनाली राम खिल खिलाकर हस पड़े और हसते हुए बोले — ‘ मित्र , उस शीशी में कोई दवा नहीं थी । था तो सिर्फ पानी था । जब तक यह पानी तुम्हारे मुँह में रहता था , तब तक तुम बोल नहीं पाते थे । तुम्हारी चुप्पी से उसने भी लड़ना – झगड़ना बंद कर दिया । ’

चकित होकर वह आदमी उनकी ओर देखने लगा । तेनालीराम ने कहा – ‘ झगड़ा दूर करने का यह एक कारगर उपाय है । सौ दवाओं की एक दवा चुप्पी होती है , इसे हमेशा याद रखो । ”

वह आदमी तेनालीराम के सामने नतमस्तक हो गया । तेनालीराम भी अपने इस प्रयोग की सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे ।

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कहानी का शीर्षक : बातूनी कछुआ

एक बार एक समय पर कंबुग्रीव नामक कछुआ एक झील के पास रहता था।  दो सारस पक्षी जो उसके दोस्त थे उसके साथ झील में रहते थे। एक बार गर्मियों में, झील सूखने लगी, और उसमें जानवरों के लिए थोड़ा सा पानी बचा था।

सारस ने कछुए को बताया कि दूसरे वन में एक दूसरी झील है जहाँ बहुत पानी है, उन्हें जीवित रहने के लिए वहां जाना चाहिए। वे योजना के अनुसार कछुए के साथ वहां जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक छड़ी को लिया और कछुए को बिच में मुँह से पकड़कर रखने को कहा और कहा कि अपने मुंह को खोलना नहीं,चाहे कोई भी बात हो। कछुआ उनकी बात मान गया।

कछुए ने छड़ी के बिच को अपने दांतों से पकड़ा और दोनों सरसों ने छड़ी के दोनों कोने को अपने चोंच से पकड़ लिया। रास्ते में गांवों के लोग कछुए को उड़ते हुए देख रहे थे और बहुत आश्चर्यचकित थे। उन दो पक्षियों के बारे में जमीन पर एक हंगामा सा मच गया था जो एक छड़ी की मदद से कछुए को ले जा रहे थे।

सरसों की चेतावनी के बावजूद, कछुआ ने अपना मुंह खोला और कहा: “यह सब क्या हंगामा क्यों हो रहा है?” ऐसा कहते ही वह नीचे गिर गया और उसकी मौत ही गई।

कहानी से शिक्षा Moral of the Story : जितना आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए। बेकार की बात ज्यादा करने से हनी स्वयं को ही होती है।

हिंदी में ईमानदार लकड़हारा की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक लकड़हारा रहता था. वह अपने काम के प्रति बहुत ईमानदार था और हमेशा कड़ी मेहनत करता था. प्रत्येक दिन वह पास के जंगल में पेड़ काटने चले जाता. जंगल से पेड़ काटने के बाद वह लकड़िया अपने गाँव लाता और सौदागर को बेच देता जिससे वह काफी अच्छा पैसा कमाता था. वह अपनी रोजमर्रा के खर्च से अधिक पैसा कमाता था जिससे उसके पास अच्छी बचत भी हो जाती लेकिन वह लकड़हारा अपने साधारण जीवन से खुश था.

एक दिन, वह नदी किनारे पेड़ काट रहा था. अचानक, उसके हाथ से कुल्हाड़ी फिसली और वह गहरे नदी में जा गिरी. वह नदी बहुत गहरी थी इसलिए वह खुद उस कुल्हाड़ी को नहीं निकाल सकता था. उसके पास सिर्फ एक ही कुल्हाड़ी थी जो अब नदी में खो चुकी थी. वह यह सोचकर बहुत परेशान हो गया.. वह सोचने लगा की बिना कुल्हाड़ी के वह अपनी आजीविका किस तरह से चला पायेगा.

वह बहुत ही दुखी हो गया, इसलिए वह भगवान से प्रार्थना करने लगा. वह सच्चे मन से प्रार्थना कर रहा था इसलिए भगवान ने उसकी बात सुनी और उसके पास आकर पूछा, ” पुत्र ! क्या समस्या हो गयी ? लकड़हारे ने अपनी सारी बात भगवान को बताई और अपनी कुल्हाड़ी लौटाने के लिए भगवान से विनती की.

भगवान ने अपना हाथ उठाकर गहरे नदी में डाला और चांदी की कुल्हाड़ी निकालकर लकड़हारे से पूछा, ” क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है ?

लकड़हारे ने उस कुल्हाड़ी को देखा और बोला, ” नहीं. भगवान ने अपना हाथ दोबारा पानी में डाला और एक कुल्हाड़ी निकाली जो सोने की बनी हुई थी.

भगवान ने उससे पूछा, ” क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है ?

लकड़हारे ने उस कुल्हाड़ी को अच्छी तरह देखा और बोला, ” नहीं भगवान ! यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है.

भगवान बोले, ” इसे ध्यान से देखो मेरे पुत्र, यह सोने की कुल्हाड़ी है जो बहुत कीमती है. सच में यह तुम्हारी नहीं है ?

लकड़हारा बोला, ” नहीं ! यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है. मैं सोने की कुल्हाड़ी से पेड़ नहीं काट सकता, यह मेरे किसी काम की नहीं है.

भगवान यह देखकर खुश हुए और अपना हाथ फिर से गहरी नदी में डाला और एक कुल्हाड़ी निकाली. यह कुल्हाड़ी लोहे की थी और भगवान ने लकडहारे से पूछा, ” यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है ?

लकड़हारा कुल्हाड़ी देखकर बोला, ” जी हाँ, यह मेरी कुल्हाड़ी है. आपका धन्यवाद. भगवान लकड़हारे की ईमानदारी देखकर बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उसे लोहे की कुल्हाड़ी दे दी, साथ में उसे दो कुल्हाड़ी उसकी ईमानदारी के लिए ईनाम में भी दी.

कहानी से सीख : यह कहानी हमें ईमानदारी की एक बहुत बड़ी सीख देती है. हमेशा ईमानदार रहो. ईमानदारी हमेशा से ही प्रशंसा की पात्र रही है. ईमानदारी हमारे नैतिक गुणों में चार चाँद लगाती है और फलस्वरूप हमें इसका बेहतर फल हमेशा मिलता है. इसलिए अपने काम के प्रति, खुद के प्रति और हर स्थिति में ईमानदार रहे.. आपको आपकी ईमानदारी का फल अवश्य मिलेगा.

अकबर बीरबल की कहानी – तीन रूपये, तीन चीज़ें

एक मंत्री की उदास शक्ल देख बादशाह अकबर ने उसकी उदासी का कारण पूछा। तब मंत्री बोले कि आप सारे महत्वपूर्ण कार्य बीरबल को सौप कर उसे महत्ता देते हैं। जिस कारण हमें अपनी प्रतिभा साबित करने का मौका ही नहीं मिलता है। इस बात को सुन कर अकबर ने उस मंत्री को तीन रूपये दिये और कहा कि आप बाज़ार जा कर इन तीन रुपयों को तीन चीजों पर बराबर-बराबर खर्च करें…यानी हर एक चीज पर 1 रुपये।

लेकिन शर्त यह है कि-

पहली  चीज यहाँ की होनी चाहिए। दूसरी चीज वहाँ की होनी चाहिए। और तीसरी चीज ना यहाँ की होनी चाहिए और ना वहाँ की होनी चाहिए।

दरबारी मंत्री अकबर से तीन रूपये ले कर बाज़ार निकल पड़ा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो अब क्या करे। वह एक दुकान से दुसरे दुकान चक्कर लगाने लगा लेकिन उसे ऐसा कोई नहीं मिला जो इस शर्त के मुताबिक एक-एक रूपये वाली तीन चीज़ें दे सके। वह थक हार कर वापस अकबर के पास लौट आया।

अब बादशाह अकबर ने यही कार्य बीरबल को दिया।

बीरबल एक घंटे में अकबर बादशाह की चुनौती पार लगा कर तीन वस्तुएँ ले कर लौट आया। अब बीरबल ने उन वस्तुओं का वृतांत कुछ इस प्रकार सुनाया।

पहला एक रुपया मैंने मिठाई पर खर्च कर दिया जो यहाँ इस दुनिया की चीज है। दूसरा रुपया मैंने एक गरीब फ़कीर को दान किया जिससे मुझे पुण्य मिला जो वहाँ यानी ज़न्नत की चीज है। और तीसरे रुपये से मैंने जुवा खेला और हार गया… इस तरह “जुवे में हारा रुपया” वो तीसरी चीज थी जो ना यहाँ मेरे काम आई न वहां ,ज़न्नत में मुझे नसीब होगी।

बीरबल की चतुराईपूर्ण बात सुनकर राजा के साथ-साथ दरबारी भी मुस्कुरा पड़े और सभी ने उनकी बुद्धि का लोहा मान लिया।

एकता में बल ” शार्ट स्टोरीज इन हिंदी

एक धर्म सिंह नाम का किसान था। उसके चार बेटे थे।

वे बहुत मेहनती और ईमानदार थे। बस अगर कोई बुरी बात थी तो यह कि उनका आपस में झगड़ा ही होता रहता था। वे किसी बात पर आपस में सहमत नहीं होते थे। यह सब देख उनका पिता धर्म सिंह बहुत दुखी होता था।

एक बार किसान धर्म सिंह बहुत बीमार पड़ गया। अब उसे यह चिन्ता सताने लगी कि अगर उसे कुछ हो गया तो उसके बेटों का क्या होगा। तभी उसे एक तरकीब सूझी। उसने बहुत सी लकड़ियां इकट्ठी की और उनका एक गट्ठर बनाया।

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किसान ने अपने बेटों को बुलाया और उन्हें बारी-बारी से वो गट्ठर तोड़ने को दिया। कोई भी उसे नहीं तोड़ सका। उसके बाद किसान ने उस गट्ठर को खोल कर सबको एक एक लकड़ी दी और तोड़ने को कहा। इस बार सबने झट से अपनी-अपनी लकड़ी तोड़ दी।

तब किसान ने सब को समझाया – ” देखो ! जब मैने तुम सब को यह गट्ठर तोड़ने को दिया तो कोई भी इसे तोड़ नहीं पाया। लेकिन जैसे ही उसे अलग करके एक-एक लकड़ी दी तो उसे सब ने आसानी से तोड़ दिया। ऐसे ही अगर तुम सब मिल कर रहोगे तो हर मुसीबत का मुकाबला कर सकते हो, जो अलग-अलग रह कर नहीं कर सकते।

यह बात किसान के चारों बेटों की समझ में आ गई और फिर सब मिल जुल कर रहने लगे। किसान भी बहुत खुश हुआ।

इसलिए कहते हैं – ” एकता में बहुत बल होता है। “

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लोमड़ी और खट्टे अंगूर हिंदी कहानी

एक लोमड़ी थी, जो अंगूर खाने की बहुत शौकीन थी। एक बार वह अंगूरों के बाग से गुजर रही थी। चारों ओर स्वादिष्ट अंगूरों के गुच्छे लटक रहे थे। मगर वे सभी लोमड़ी की पहुंच से बाहर थे।

अंगूरों को देखकर लोमड़ी के मुंह में बार-बार पानी भर आता था। वह सोचने लगी- ‘वाह! कितने सुन्दर और मीठे अंगूर हैं। काश मैं इन्हें खा सकती।’ यह सोचकर लोमड़ी उछल-उछल कर अंगूरों के गुच्छों तक पहुंचने की कोशिश करने लगी। परंतु वह हर बार नाकाम रह जाती। बस, अंगूर के गुच्छे उसकी उछाल से कुछ ही दूर रह जाते।

एक तो भूख के मारे पहले ही वह अधमरी हुई जा रही थी दूसरें यहां कहीं-कहीं फिट उछलने के कारण उसकी पसलियां हिल गई थी। अंन्ततः थक-हारकर उसने उम्मीद ही छोड दी ।

अंत में बेचारी लोमड़ी उछल-उछल कर थक गई और अपने घर की ओर चल दी। जाते-जाते उसने सोचा- ‘ये अंगूर खट्टे हैं।

जब किसी कार्य में सफलता नहीं मिले तो बार-बार प्रयास करना चाहिए न कि उस कार्य को असाध्य समझ कर छोड देना चाहिए

एक गरीब किसान की कहानी

ये कहानी एक गरीब किसान की है, जो की बहुत ही ज्यादा गरीब तो है ,साथ ही बहुत मेहनती भी है. उसकी मेहनत की दास्तान ही इस कहानी का रियल मोटिव है. तो क्या होता है इस कहानी मैं अब हम आपको बताते है. ये बात कई साल पुरानी है. किसी राज्य में एक राजा हुआ करता था. राजा ने एक बार अपने राज्य के लोगों की परीक्षा लेनी चाही. एक दिन उसने क्या किया कि सुबह सुबह जाकर रास्ते में एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया.

अब तो सड़क से जो कोई भी निकलता उसे बड़ी परेशानी हो रही थी. लेकिन कोई भी पत्थर हटाने की कोशिश नहीं कर रहा था . राजा यह सब छुपकर देख रहा था, कुछ देर बाद उसके राज्य के मंत्री और अन्य बड़े बड़े और धनी लोग भी वहाँ आए लेकिन किसी ने भी पत्थर हटाने की कोशिश नहीं की बल्कि सभी राजा को ही गालियाँ दे रहे थे कि रास्ते में इतना बड़ा पत्थर पड़ा है और राजा इसे हटवा क्यूँ नहीं रहा है. कुछ देर बाद वहाँ एक ग़रीब किसान आया जिसके सर पे बड़ा सा सब्जी का गट्ठर रखा हुआ था जब वह पत्थर से गुज़रा तो उसे वजन की वजह से काफ़ी परेशानी हो रही थी.

तो उसने अपने सर से सब्जी की गठरी उतारी और पत्थर को पूरी ताक़त से हटाने में जुट गया. वो पत्थर बहुत बड़ा था लेकिन किसान ने हार नहीं मानी और कुछ ही देर में रास्ते से पत्थर हटा दिया. जैसे ही वो वहाँ से चला उसने देखा की पत्थर वाली जगह पर एक थैला पड़ा हुआ था जोकि राजा ने पत्थर के नीचे छुपा दिया था.

किसान ने थैला खोला तो देखा उसमें सोने के 10000 सिक्के थे और एक पत्र था जिसमें लिखा था, पत्थर हटाने वाले को राजा की ओर से इनाम. अब तो किसान फूला नहीं समा रहा था.तो दोस्तों इससे पता चलता है की एक अमीर आदमी से एक गरीब आदमी की सोच कितनी सकारात्मक होती है और जबकि अमीर बहुत ही आलसी इंसान हो जाता है. 

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