स्वामी दयानंद सरस्वती पर निबंध – Swami Dayanand Saraswati Essay in hindi

इस विस्तृत लेख में हम आपको स्वामी दयानंद सरस्वती पर निबंध दे रहे है. यहाँ से आपको 200 शब्दों में – 500 word में निबंध मिल जायगा. कोई इसे भाषण के रूप में या फिर निबंध लेकन के रूप में इस्तेमाल कर सकते है. swami dayanand saraswati Essay in hindi, English and Sanskrit में भी दिया गया है. आप यहां से सभी के PDF file भी download कर सकते है.

स्वामी दयानंद सरस्वती पर निबंध

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swami dayanand saraswati Essay

उन्नीसवीं शताब्दी के महान समाज-सुधारकों में स्वामी दयानंद सरस्वती – Swami Dayanand Saraswati का नाम अत्यंत श्रध्दा के साथ लिया जाता है.

एस वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में गुजरात के काठियावाड़ा जिले के टंकरा गाँव में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्ण लाल तिवारी और उनकी माता श्रीमती यशोदाबाई थीं। उनका परिवार संपन्न और धार्मिक विचारों वाला था। उनके माता-पिता शैव पंथ के कट्टर अनुयायी थे।

मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उन्हें मूलशंकर कहा जाता था। उनके माता-पिता ने उन्हें स्नेही तरीके से पाला। बचपन से ही, मूलशंकर बहुत प्रतिभाशाली थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती का बचपन

बचपन से ही, मूलशंकर बहुत प्रतिभाशाली थे। कहा जाता है कि उन्होंने दो साल की उम्र में गायत्री मंत्र सीखना शुरू कर दिया था। धार्मिक दृष्टिकोण और परिवार की शिव आराधना की प्रवृत्ति के कारण उन्होंने शिव के प्रति अनुराग विकसित किया था।

जैसे-जैसे वह बड़े होते गए, उनके पिता ने उन्हें अपने घर पर शिक्षा प्रदान करना शुरू कर दिया। सबसे पहले, उन्होंने उन्हें धर्मशास्त्र के बारे में शिक्षित किया। उसके बाद मूलशंकर ने संस्कृत का अध्ययन करने का निर्णय लिया, इसलिए उन्होंने उन्हें संस्कृत पढ़ाना शुरू किया। 14 वर्ष की आयु तक, मूलशंकर ने संपूर्ण संस्कृत व्याकरण, सामवेद और यजुर्वेद का अध्ययन किया था।

महान समाज सुधारक

स्वामी दयानंद सरस्वती एक समाज सुधारक और व्यावहारिकता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के कई अनुष्ठानो के खिलाफ प्रचार किया। उन अनुष्ठानो के खिलाफ प्रचार करने के कुछ मुख्य कारण थे – मूर्ति पूजा, जाति भेदभाव, पशु बलि, और महिलाओं को वेदों को पढने की अनुमति ना देना।

वो ना सिर्फ एक महान विद्वान और दार्शनिक थे बल्कि वो एक महान समाज सुधारक और राजनीतिक विचार धरा के व्यक्ति थे। स्वामी दयानद सरस्वती जी के उच्च विचारों और कोशिश के कारण ही भारतीय शिक्षा प्रणाली का पुनरुद्धार हुआ जिसमें एक ही छत के नीचे विभिन्न स्तर और जाति के छात्रों को लाया गया जिसे आज हम कक्षा के नाम से जानते हैं।

आर्यसमाज की स्थापना

महर्षि दयानंद ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 1932 को गिरगाँव बंबई में आर्यसमाज की स्थापना की। अपने महाग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामीजी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खंडन किया है। स्वामी दयानंद के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने 1886 में लाहौर में ‘दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज’ की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानंद हरिद्वार के निकट काँगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की।

एक स्वदेशी रुख अपना कर उन्होंने हमेशा एक नया समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक दौर का शुरुवात किया। वेदों से अच्छी विचारधारा और प्रेरणा लेकर उन्होंने समाज के कई बुरी प्रथाओं को दूर करने का प्रचार शुरू किया था।

धार्मिक विचार – सामाजिक कार्य

महर्षि देवानंद के महान कार्यो में महिलायों के हक्को के लिए लड़ना भी शामिल है. महिलाओ के हक्क जैसे- पढाई करने का अधिकार, वैदिक संस्कृति पढने का अधिकार इन सब पर उन्होंने उस समय ज्यादा जोर दिया, ताकि सभी लोग हिंदु संस्कृति को अच्छी तरह से जान सके. दयानंद वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दलितों को स्वदेशी और हरिजन अजिसे नाम दिए और महात्मा गांधी से पहले अछूत परंपरा को दूर किया था.

भारतीय स्वतंत्रता के अभियान में महर्षि दयानंद सरस्वती का बहोत बड़ा हात था. उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के समाज सुधारक काम किये. और साथ लो लोगो को स्वतंत्रता पाने के लिए प्रेरित भी किया.

दयानंद सरस्वती का निधन

स्वामी दयानंद सरस्वती का निधन: ३० अक्टूबर १ स्वामी स्वामी३ स्वामी दयानंद का विष प्रयोग ( या फिर भोजन में काँच के बारीक टुकड़े ) की वजह से हुआ.

कहा जाता है कि 1857 में स्वतंत्रता-संग्राम में भी स्वामी जी ने राष्ट्र के लिए जो कार्य किया वह राष्ट्र के कर्णधारों के लिए सदैव मार्गदर्शन का काम करता रहेगा. स्वामी जी ने विष देने वाले व्यक्ति को भी क्षमा कर दिया, यह बात उनकी दयाभावना का जीता-जागता प्रमाण है.

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स्वामी दयानन्द सरस्वती महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। उनका बचपन का नाम ‘मूलशंकर’ था।

उन्होंने ने 1874 में एक महान आर्य सुधारक संगठन – आर्य समाज की स्थापना की। वे एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामीजी ने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया।

उन्होने ही सबसे पहले १८७६ में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। स्वामी दयानन्द के विचारों से प्रभावित महापुरुषों की संख्या असंख्य है।

स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने १८८६ में लाहौर में ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज’ की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने १९०१ में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की। .

स्वामी दयानंद सरस्वती पर निबंध संस्कृत में

swami dayanand saraswati essay in sanskrit

भारतभूमिः महापुरुषाणां भूमिरस्ति। अत्र अनेक महापुरुषाः अभवन्। तेष महर्षिः दयानन्दः अग्रगण्यः अस्ति।

दयानन्दमहोदयस्य जन्म गुजरात प्रान्तस्य टंकाराम्नि ग्रामे चतुर्विंशत्याधिकाष्टादशतमे अब्दे अभवत्। अस्य शैशवे प्रथमाभिधानं ‘मूलशंकरः’ आसीत्। अस्य पितु: नाम अम्बाशंकरः आसीत् स च शिवभक्तः आसीत्। यथा पिता शिवभक्तः तथा पुत्रः मूलशंकरः अपि शिवस्य भक्त: अभवत्। सः एकदा महाशिवरात्रिअवसरे उपवासम् आचरत्। देवालये सर्वे जनाः कीर्तनजागरणे मग्नाः आसन्। अर्धनिशीथे सर्वे भक्ताः सुप्ता: किन्तु मूलशंकरः निद्रां न गतः। सः अपश्यत् यत् एका मूषिका तत्रागत्य नैवेद्यम् अभक्षयत्, पूजासामग्रीं च अन्यत्र अनयत्। एतत् दृष्टवा: तस्य मूर्तिपूजायाः उपरि विश्वासः नष्टो जातः। तस्य मनसि अनेक प्रश्नाः अजायन्त। किन्तु तेषाम् उत्तराणि दातुं कोऽपि समर्थः नाभवत्। ततः तेन दृढनिश्चयो कृत: यत् संसारस्य उत्पत्याः परित्राणस्य च कर्ता शिवः अस्ति अतः तस्मैव आराधना कर्तव्या। शिवस्य दर्शनं गुरुणा विना दुर्लभमस्ति इति तेन अनुभूतम्।

गुरोः अन्वेषार्थं सः एकस्मिन् दिने गृहात् निर्गतः। विविधेषु तीर्थेषु, नगरेषु च भ्रमन अन्ततः मथुरायां विरजानन्द नाम गुरोः शिष्यः अभवत्। श्रीविरजानन्दः जन्मांधः आसीत् परं स: अतीव विहान् आसीत्। सः भूलशंकरं वेदान् आर्यग्रंथान् च अपठयत्। गुरोः शिक्षां प्राप्य मूलशंकर: महर्षिः दयानन्दः सरस्वती इति नाना विख्यात: बभूवः।

यदा दयानन्द: गुरोः समीपे गुरुदक्षिणां दातुम् अगच्छत् तदा सः महात्मा गुरु: अवदन् ‘यदि मध्य किंचित दानुमिच्छसि तर्हि सत्यस्य प्रचारं कुरू, वेदानां प्रचारं कुरु। अन्यत् अह किमपि न कामये’ इति। ततः गुरोः आज्ञया, दयानन्दमहर्षिणा सम्पूर्णे भारते वेदानां प्रचारः कृतः। आजीवनम् सत्यप्रचार: कृतः। तेन बालविवाहस्य, वृद्धविवाहस्य सदा प्रतिषेधः कृतः। सः स्त्रीशिक्षायाः समर्थकः आसीत्। अनेन आजन्म ब्रह्मचर्यव्रतं पालितम्। यावज्जीवं देशवासिनां हितं कृतं। एतादृश: महापुरुषः सर्वेः नित्यं स्मरणीयः।

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Original name of Swami Dayanand was Mulashankar who was born in 1824, in a Brahmin family, in Morvi state (Gujarat). At the age of 21 he left home and became an ascetic. At the age of 36 he spent two and a half years at Mathura as disciple of a saint scholar Swami Virjananda (A blind man), who taught him the philosophical interpretation of the Vedas and asked him to purity Hinduism and to preach the true Vedic religion. He founded the Arya Samaj in 1875 in Bombay.

Two years later the headquarter was shifted to Lahore. He translated the Vedas and wrote three books (A) Satyartha Prakash (Hindi) (B) Veda Bhashya Bhumika and (C) Veda Bhashya (Sanskrit).

Dayanand Saraswati was a Vedic scholar a social reformer and a dialectician. He is known in the History of Indian political theory for two reasons i.e. (A) He prepared the foundations of India’s political Independence and (B) He founded a powerful organization like the Arya Samaj which carried on important social and educational work in Northern India.

Dayanand was a prophet of perfect Vedism. He wanted to solve the problems of life in accordance with the Vedic Canons. He said that the Vedas contained eternal, pure and pristine knowledge given to humanity at the time of creation. He stated that the Vedas contained both spiritual metaphysical knowledge and the secrets of scientific physical knowledge.

Dayanand taught the supremacy of strength, energy, fevour and a dynamic sense of responsibility. In his book Satyarth-Prakasha he states that Indias downfall “Is due to mutual feud, differences in religion, want of purity in life, lack of education, child marriage, in which the contracting parties have no voice in the selection of their life-partners, indulgence in carnal gratifications, untruthfulness and other evil habits, the neglect of the study of the Veda and other malpractices.”

Besides the Arya Samaj, Dayanand also established a philanthropic association “The Paropkarini Sabha’ which has threefold duties to perform viz. (A) To spread the knowledge contained in the Vedas and the Vedangas (B) To send missionaries in all parts of the world for teaching the Vedic dharma and (C) To give protection and true education to the orphans and indigent inhabitants of India. According to V.P. Verma “Dayanand felt the supreme urgency of the

emancipation of the depressed and fallen section of Indian society, but he was also intensely keen upon the spread of the pure faith of the Vedas in the world. He was a great champion of the concept of world brotherhood. But his internationalism did not visualize any idea of the political federation of the nation of the world. It was only the romantic internationalism of a preacher and prophet who dreamt of the down of the day when the entire world would adhere to the teachings of the Vedas.”

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