निबंध क्या है – निबंध की परिभाषा, विशेषताएं और जानकारी हिंदी में

January 31, 2020 Education, Study Materials
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निबंध यानि ‘बँधा हुआ’. फिर भी कई लोग द्वारा माना जाता है की जिसमे कोई बंधन न हो इसे निबंध कहाँ जाता है. फिर भी किसी लेखन शैली की मर्यादा के बिना अच्छे निबंध का निर्माण नहीं हो सकता है. निबंध भी एक व्यवस्थित विचार, लेखन के ढांचे के साथ लिखा जाता है. यहाँ आपको निबंध क्या है? निबंध के तत्त्व क्या है, निबंध की परिभाषा क्या है? निबंध की विशेषताए क्या है? एक अच्छा निबंध कैसे तैयार होता है ये सभी की विस्तृत जानकारी यहाँ से मिलेगी.

निबंध का क्या अर्थ है

निबंध की कोई विशेष निबंध की परिभाषा प्रस्तुत नहीं की जा सकती, क्योंकि विषय के अनुसार इसके रूप और परिमाण में पर्याप्त विभिन्नताएँ होती हैं। हिंदी शब्दकोशों में ‘निबंध’ शब्द के कई अर्थ दिए गए हैं; जैसे—रचना, लिखना, जोड़ना, बाँधना; संग्रह, शृंखला, नींव, उत्पत्ति, कारण, हेतु। अंग्रेजी में निबंध को ‘एसे’ (Essay) कहते हैं, जो उत्तरी फ्रांसीसी शब्द ‘एसाई’ से उत्पन्न है। इसका अर्थ है—‘प्रयत्न’ या ‘किसी विषय पर गद्य में लिखी गई छोटी साहित्यिक रचना।’ सत्य तो यह है कि निबंध की सीमा निर्धारित करने में विद्वानों में मतैक्य नहीं है।

निबंध की परिभाषा हिंदी में

nibandh ki paribhasha definition of-essay hindi Nibandh kya hai

कुछ विद्वानों के मत से—निबंध ‘अस्त-व्यस्त विचारों का प्रकाशन मात्र’ है। अंग्रेजी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार डॉ. जॉनसन ने आधुनिक निबंध को ‘मन की मुक्त उड़ान’ कहकर संबोधित किया है और निबंध की परिभाषा इस प्रकार की है—‘‘निबंध मानसिक विश्व का वह बुद्धि-विलास है, जिसमें क्रम और नियम का अभाव है। इसे विचारों की अधूरी और अव्यवस्थित रचना मात्र माना जा सकता है।’’ बेन्सन ने कहा है—‘‘निबंध के संबंध में मुख्य बात विषय-वस्तु न होकर निबंध लेखक की कथन-शैली है, उसका व्यक्तित्व है।’’ लिंड का कथन है—‘‘निबंध की विषय-वस्तु असीम है।

एक महान् विजेता या नेता की मृत्यु से लेकर दीवार पर बना एक चिह्न तक निबंध की विषय-वस्तु बन सकता है।’’ ‘ऑक्सफोर्ड कंसाइज डिक्शनरी’ में निबंध की व्याख्या इन शब्दों में की गई है—‘‘निबंध एक साहित्यिक रचना है, जो किसी भी विषय पर हो सकती है और जो साधारणतया लघु तथा गद्य में होती है।’’

इसके विपरीत, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक श्यामसुंदर दास का मत है—‘‘निबंध वह लेख है, जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तृत और पांडित्यपूर्ण विचार किया जाता है।’’

निबंध किसे कहते हैं

इस प्रकार विद्वानों में निबंध के संबंध में परस्पर विरोधी मत देखने को मिलते हैं। किंतु जो भी हो, निबंध में क्रमबद्धता आवश्यक है। विचारों और दृष्टिकोण की विकासोन्मुखता परमावश्यक है और इसका विस्तार १ से लेकर ५०० पृष्ठों तक हो सकता है। निबंध के लक्षणों के साथ यह क्रमबद्धता किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचनी चाहिए; लेकिन इसके अपवाद भी हो सकते हैं। यह केवल किसी विषय-विशेष पर विचारों का अभिव्यंजन भी हो सकता है।

प्रताप नारायण मिश्र के निबंधों में अनेक शैलियों का उपयोग हुआ है। उन्होंने ‘आप’, ‘दाँत’, ‘व + कील’, ‘अदा+ लत’ बड़े ही कुतूहल और विचित्र निबंध लिखे हैं। वैज्ञानिक प्रणाली की परवाह न करके जिस स्वतंत्र और उन्मुक्त हृदय से उन्होंने अपने विचारों की अभिव्यंजना पाठकों तक पहुँचाई है, उससे निबंध की परिभाषा प्रतिष्ठित होती है कि निबंध विचारों के प्रकट करने का एक माध्यम मात्र है।

भारत और यूरोप के निबंध-साहित्य का विकास समान रूप से हुआ है। उनकी शैलियों, उद्देश्यों तथा उपकरणों में अनेक विभिन्नताएँ हैं। सामान्य रूप से निबंध में निम्न बातों का समावेश किया जा सकता है—

निबंध की विशेषताएं

निबंध एक छोटी गद्य-रचना को ही कहा जाता है। इसका आकार अपेक्षाकृत छोटा होना चाहिए। यद्यपि ४००-५०० पृष्ठों में समानेवाली रचना भी कभी-कभी निबंध के नाम से पुकारी जाती है; किंतु अनिवार्य रूप से निबंध का उद्देश्य मन की उन्मुक्त उड़ान, रसास्वादन, सौंदर्य की खोज और आनंद-बोध है। कहा गया है—‘गद्यं कवीनां निकषं वदति।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसको परिमार्जित रूप में इस प्रकार कहा है—‘‘यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है।’’ इसलिए हम निबंध उसी को कह सकते हैं, जिसमें हमें गद्य का सुविकसित तथा परिष्कृत रूप प्राप्त हो सके।

Essay meaning in hindi

जे.बी. प्रीस्टल ने स्पष्ट कहा है—‘‘सच्चे निबंधकार के लिए किसी विशेष विषय का बंधन नहीं। वह अपनी इच्छानुसार संसार का कोई भी विषय चुन सकता है। उसमें किसी भी विषय को अपने ढंग से झुकाने और मोड़ने की भरपूर शक्ति रहती है, क्योंकि इस कौशल के माध्यम से ही वह वस्तुतः अपने व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार एक अपरिचित विषय पर भी प्रसन्नता के साथ निबंध लिख सकता है। वह निबंध में केवल अपने अज्ञान की बानगी देगा।

सच्चा निबंध किसी रहस्यालाप या प्रेमालाप की तरह मधुर होता है तथा सच्चे निबंधकार की पाठक से जो हित-वार्त्ता होती है, वह चतुराई से भरी और पाठक को प्रभावित करनेवाली होती है। एक-एक शब्द की अभिव्यक्ति उसके अंतर के तारों से ध्वनित होकर निकलती है; उन शब्दों में उसके अंतस्तल की अगाध गहराई और आकुलता ध्वनि बनकर समा रही होती है।

इस प्रकार ‘लघुता’ आधुनिक वैयक्तिक निबंध का प्रधान गुण है। इस व्यक्त युग में दीर्घ कथा का स्थान छोटी गल्प या लघु-कथन ने ले लिया, दीर्घ काव्य-महाकाव्य चतुर्दशियों या सॉनेट में बदल गए। पाँच अंक के बडे़-बड़े नाटकों की जगह एकांकी ने घेर ली। बड़े-बड़े प्रबंधों की अपेक्षा छोटे निबंधों को विशेष लोकप्रियता मिली। डब्ल्यू. ई. विलियम्स ने लिखा है—‘‘निबंध की स्वल्पतम परिभाषा यह है कि यह गद्य-रचना का एक प्रकार है, जो बहुत छोटा होता है और जिसमें केवल वर्णन नहीं होते। कभी-कभी निबंधकार अपनी बात को सिद्ध करने के लिए प्रसंगों का सहारा ले सकता है; परंतु उसका मूल उद्देश्य कथा कहना नहीं है, उसका मुख्य कार्य सामाजिक, दार्शनिक, आलोचक या टिप्पणीकार के समान होता है।’’ इस तरह निबंध की परिभाषा के कई रूप आपको देखने मिलते है.

जैसा कि बेंसन ने एक स्थान पर कहा है—‘‘निबंधकार जीवन की समग्रता का अनुभव और आनंद ग्रहण करना चाहता है। कवि की भाँति जीवन की विराटता, सूक्ष्मता या सुंदरता से ही उसे प्रयोजन नहीं होता। निबंधकार जीवन की दीप्ति से संतुष्ट है, पूर्ण प्रकाश या ज्वाला की अनुभूति से उसका कोई प्रयोजन नहीं। अतः निबंधकार रोमांस लेखक के विपरीत है। वह तो जीवन का तटस्थ द्रष्टा है। वह कल्पना के स्वप्नलोक में अपने आपको भुला नहीं देना चाहता। वह हमारी मंजिल का मीत और सफर का साथी है।

निबंधकार की मनोदशा चाहे जो भी हो, वह जीवन को देखने के लिए पचासों दृष्टि-प्रकार रखता हो, किंतु वह जीवन की उपेक्षा या उसका तिरस्कार करके एक पल भी नहीं जी सकता। जीवन की अवहेलना का दूसरा नाम निबंधकार की मृत्यु है। बिना सहृदयता के किसी को किसी वस्तु के विषय में सोचने का अधिकार नहीं है। जीवन में हम जो सोचते हैं, उसमें कितनी अधिक विविधता भरी हुई है। इस प्रकार निबंधकार जगत् और जीवन को न तो इतिहासकार की भाँति देखता है, न दार्शनिक, कवि और उपन्यासकार की भाँति, फिर भी निबंधकार इन सब गुणों से पूर्ण होता है।

निबंध में लेखक के निजी दृष्टिकोण की प्रधानता रहती है। वह सर्वत्र स्वयं को प्रकट करता हुआ चलता है। उसका व्यक्तित्व गरजता हुआ चलता है। वह निजी अनुभवों के आधार पर अपनी रचना का निर्माण करता है। निबंध स्वयमेव एक इकाई होता है, वह अपने आप में पूर्ण होता है। निबंध की संज्ञा उसी को दी जा सकती है जिसमें लेखक द्वारा किसी भी विषय पर विचारों का परिमार्जित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया हो। उसमें व्यक्तिगत विशेषता रहती है, परंतु वह कृत्रिम वातावरण उपस्थित करके उत्पन्न नहीं की जाती, अपितु उसमें पूर्ण स्वाभाविकता का निर्वाह किया जाता है।

डॉ. पृथ्वीनाथ पांडेय के अनुसार, ‘‘निबंध लिखना अभ्यास से आता है। निबंध लेखक के ज्ञान की कसौटी है। उथला या पांडित्य-प्रदर्शन के भाव से लिखा गया अथवा उलझे हुए भावों से बोझिल निबंध व्यर्थ होता है। ‘निबंध’ शब्द का अर्थ है—‘बँधा हुआ’, अतः थोड़े से, अत्यंत चुने हुए शब्दों में किसी विषय पर अपने विचार प्रकट करने के प्रयत्न को ‘निबंध’ कह सकते हैं। निबंध के विषयों की कोई सीमा नहीं होती। आकाशकुसुम से लेकर मिट्टी के पदाक्रांत कण तक सभी निबंध के विषय हो सकते हैं।’’

निबंध के लिए यह आवश्यक नहीं कि पूरे निबंध का रूप एक ही हो। प्रत्येक निबंध के आदि, मध्य और अंत का विभाजन ठीक-ठाक होना चाहिए।

  • निबंध का आरम्भ कैसा होना चाहिए

निबंध का आरंभ ऐसे सुंदर ढंग से होना चाहिए कि उसे पढ़ते ही पाठकों की उत्सुकता बढ़े और वे आप-से-आप उसे पूरा पढ़ डालने के मोह का संवरण न कर सकें। इसके अतिरिक्त लेखक को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि पाठक ज्यों-ज्यों उसके निबंध को पढ़ता चले, उसे आरंभ से ही ऐसी सामग्री मिलती चले कि उसकी यह धारणा बन जाए कि उसे इस लेख में मौलिक ढंग से लिखी हुई कुछ मनोरंजक और विचारपूर्ण बातें पढ़ने को मिलेंगी।

  • निबंध का मध्यभाग

निबंध का मध्य भाग सबसे अधिक विस्तृत होता है। आदि से इसका संबंध होना चाहिए और इसके सभी सिद्धांत, सभी वाक्य एक-एक करके निश्चित परिणाम की ओर झुके हुए होने चाहिए। निबंध के मध्य में ही लेखक पाठक को अपने तर्क समझाने का प्रयत्न करता है।

  • निबंध का अंत

निबंध के अंतिम अंश के संबंध में लेखक को यह ध्यान रखना चाहिए कि निबंध अनायास न समाप्त हो जाए। यदि ऐसा हुआ तो पाठक को निबंध रुचिकर न लगेगा और वह उसकी शैली को दूषित प्रमाणित करेगा। निबंध की समाप्ति ऐसी होनी चाहिए कि उसे समाप्त कर देने पर भी उसकी विचारधारा के मूल भाव पाठक के मन में बार-बार आते रहें। वह निबंध अत्यंत सफल माना जाता है, जिसका अंत ऐसा हो कि पाठक का ध्यान एक बार फिर लेखक के तर्कसंगत भावों की ओर आकर्षित हो जाए और वह गुण व दोष के संबंध में अपना एक निश्चित मत दे सके।

निबंध के आदि, मध्य और अंत—तीनों को पदों में शीर्षकों के अनुसार विभाजित करना चाहिए। वह चाहे बड़ा हो या छोटा, सबका संबंध एक-दूसरे से होना चाहिए। पदों में छोटे और बड़े दोनों प्रकार के वाक्यों के प्रयोग आवश्यकतानुसार होने चाहिए। जहाँ बात समझानी हो या विषय कठिन हो, वाक्य का लंबा हो जाना कोई दोष नहीं है। हर समय और हर स्थान पर केवल छोटे-बड़े वाक्यों के प्रयोग से निबंध में अस्पष्टता आ जाने की संभावना बनी रहती है। दोनों प्रकार के वाक्यों का प्रयोग समय और स्थान के अनुसार ही करना उचित रहता है।

निबंध का गद्य में वही स्थान है, जो मुक्तक का पद्य में है। मुक्तक की तरह निबंध भी अपने आप में पूर्ण होता है। व्यक्तिगत स्वच्छंदता उसकी अपनी पहचान है। निबंध के लिए अनिवार्य है कि व्यक्तिगत विचार का क्रम, तारतम्य और निरंतरता का निर्वाह एक साथ किया गया हो, वैयक्तिकता बुद्धिसंगत तथा विवेकपूर्ण हो।

साधारण गद्य की अपेक्षा निबंध अधिक सजीव और रोचक होता है, क्योंकि उसमें केवल विवरणों का ब्योरा नहीं रहता अपितु व्यक्ति के विचारों और अनुभूतियों की अभिव्यंजना के अनुसार, हास्य-व्यंग्य, विनोद, ध्वनि-बलिष्ठता, गंभीरता तथा लाक्षणिकता का उचित समावेश होता है। गीतिकाव्य की तरह निबंध में भी व्यक्ति के अपनत्व और प्रतिभा को पंख लग जाते हैं।

यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि निबंध में काव्य के सभी तत्त्वों का समावेश हो जाता है। शैली का वैशिष्ट्य निबंध की अपनी विशेषता है। शैली-तत्त्व ही निबंध को व्यक्ति का अपनापन प्रदान करता है। यही शैली-तत्त्व साहित्य की अन्य विधाओं के उपकरणों को अपने में लीन करता चलता है। कहानी और खंड काव्य के समान निबंध के सामने भी एक लक्ष्य होता है, जिस पर वह सतर्कता के साथ पहुँचता है।

निबंध का क्षेत्र

निबंध का क्षेत्र आकाश की तरह असीम है। जैसा कि बताया जा चुका है, आकाशकुसुम से लेकर मिट्टी के पदाक्रांत कण तक पर निबंध लिखा जा सकता है। निबंध अपने क्षेत्र में पूर्ण रूप में स्वतंत्र है। कविता, उपन्यास और कहानी की तरह इसके लिए किसी तरह का बंधन नहीं है। बात स्पष्ट है, क्योंकि कविता यदि नीरस विषय को सरसता प्रदान करने का प्रयत्न करेगी तो संभवतः वह अपने आप ही मुरझा जाएगी, उबाऊ उपन्यास भी पाठकों के अनुराग का पात्र नहीं बन पाएगा। किंतु निबंध की दशा में कोई बंधन नहीं, कोई रुकावट नहीं। केवल कुछ चुने हुए सुलझे शब्दों द्वारा नीरस-सरस सभी विषयों पर निबंध लिखा जा सकता है। यदि आपकी इच्छा है तो आप नाक, कान, आँख, दाँत आदि पर लिख सकते हैं। यहाँ तक कि अपने ‘आप’ पर भी लिख सकते हैं। गोचर-अगोचर, भली-बुरी, काली-गोरी, छोटी-बड़ी, सुंदर-असुंदर, नमकीन-स्वादिष्ट : सब पर निबंध लिखे जा सकते हैं। निबंध का सुंदर सजाव-शृंगार या कुरूप बनाव-बिगाड़ लेखक की प्रतिभा का परिचायक है।

निबंध का महत्त्व

किसी भी विषय का सम्यक् किंतु संक्षिप्त तथा कम-से-कम समय में ज्ञान कराने में निबंध के अतिरिक्त यदि और भी कोई साहित्य का माध्यम है तो हम उसे नहीं जानते। निबंध के द्वारा पाठक का ज्ञान तो बढ़ता ही है, साथ ही पाठक के हृदय में तदनुसार खोज करने और पर्यवेक्षण की जिज्ञासा भी उत्पन्न होती है। निबंध के माध्यम से हम अपनी मानसिक शक्तियों को सीमित करके उनका विकास करना सीखते हैं तथा कम-से-कम समय में सस्ते-से-सस्ते साधन द्वारा अधिक-से-अधिक अनुभवों की चिरसंचित राशि अल्प प्रयास में ही लूटने का अवसर प्राप्त करते हैं।

आपको यहाँ विस्तृत रूप से निबंध की परिभाषा के बारे में बताया गया है. साथ में निबंध के विविध स्वरुप और अवधारण के बारे में भी काफी जानकारी शेयर की गयी है. आप इसे पढ़कर एक अच्छे निबंध लेखन का कार्य कर सकते है.

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